Sunday, October 2, 2011

mahanagar mein chaand by krishmohan jha

महानगर में चाँद को देखकर
मुझे चाँद पर रोना आता है
और चाँद को रोना आता है इस हाल में मुझे पाकर

लगता है
पिछले जनम की बात है यह
जब कातिक की साँझ या बैसाख की रात में
चाँद और मैं
आँगन से दालान
और दलान से आँगन
इस प्रतियोगिता में भागते थे
कि देखें कौन पहुँचता है पहले
(और मैं हर बार हार जाता था उससे
क्योंकि उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ा था वह)

या फिर बाद के वर्षों में
जब मेरी हल्की-हल्की मूँछें निकल आईं थीं
और मेरे सीने में अक्सर दुखती हुई शाम
एक उदास आवारगी में लपेटकर मुझे
यहाँ-वहाँ चली जाती थी-
तब चाँद ही था मेरा सहचर
जिसके मुलायम कंधे पर मैं रखता था अपना सर

लेकिन कुछ ही वर्षों बाद
हम दोनो ऐसे बिछड़े
जैसे ब्याह के बाद बिछुड़ती हैं
गाँव की जुड़वाँ बहनें
और उसका समाचार तभी-तभी पाया
जब दुःख ने उसे घेरा
जब ग्रहण ने उसे खाया

…और आज
इतने युगों बाद
जब हम हैं आमने-सामने
तो कातरता से रूंधा है मेरा गला
कुछ कहते बने न कुछ सुनते बने

महानगर में
गुमशुदा की तलाश में निकले
बड़े भाई सा जर्जर चाँद
चाँद का धूसर विज्ञापन लगता है
बस की खिड़की से बार-बार बाहर झाँकता हुआ मैं
लगता हूँ एक खोए हुए आदमी का विज्ञापन
तथा धरती और आसमान से वंचित
त्रिशंकु की तरह
बीच में लटका हुआ
घर
देखो घर का कैसा विज्ञापन लगता है

kisne kaha hoga by divik ramesh

तुम मुझे खून मत दो
मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।

ऐसा
न सुभाष ने कहा
न गाँधी ने।

तब किसने कहा होगा?

मारा मारा फिरा
उठाए
इस प्रश्न के शव को
कंधों पर

टटोल डाले सारे पन्ने
अच्छे अच्छे दिमागों के

न बुश ने कहा, न पुतिन ने
न मुशर्रफ ने कहा न सोनिया ने
आखिर किसने कहा होगा?

उधेड़ डाली अनुभव की एक एक गुदड़ी
छान डाला
एक एक पंथ
जवाब कहीं नहीं था पर ।
आखिर किसने कहा होगा?

अचानक सूझा
कि किसी और ने नहीं
मेरे मन ने कहा था यह।
और वह भी
बस एक नयी बात कहने के चक्कर में

मैंने उत्तर दिया
'मैंने कहा था`।

देखा
प्रश्नकर्त्ता
फिर अपनी जगह
जा टंगा था।