Friday, May 31, 2013

ड्राईवर ढाबा

अचानक आज रात को बहुत जोर से भूख लगी और अचानक लगने वाली भूख अक्सर बहुत खतरनाक हुआ करती हैं ख़ास कर तब ,जब आप घर पे रहने के बजाए किसी सुदूर हॉस्टल में रहते हैं और ऊपर से मेस का खाना देख कर उसको खाने का सिर्फ एक ही तरीका नज़र आता है कि आप किसी विफल अफ़्रीकां देश के भूके लोगों को याद करें और खुदा का शुक्र करें कि यह खाना उस हाल  से तो बेहतर ही है (अगर आप कुछ ज्यादा ही देश भक्त हैं तो फिर अपने लाखों स्वदेशी भाई और बहनों की ही  सूरत को सामने ला कर खाने को गले से नीचे उतार सकते हैं )
ऐसी सूरत ए हाल  में जो नाम किसी सुरंग में  रौशनी की तरह काम करता है या किसी सूनसान समुद्री टापू पर किसी जहाज़ कि आहट जैसे खुशी का अहसास दिलाता है वो है  ''ड्राईवर ढ़ाबा''
आप रात के ढाई बजे एक नंबर लगाते हैं और उसको बताते हैं कि आप गेट तक आ पहुंचे हैं और वो गरमा गरम पराठे ले कर (प्याज और सॉस के साथ) फ़ौरन हाज़िर हो जाए,और फिर इत्मीनान के साथ अपना रूमबंद करके गेट कि तरफ चल देते हैं |
मैंने कभी दूसरी तरफ का नज़ारा नही देखा मगर उसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ जैसे जाड़ो की  कोई सर्द रात होगी और कोई बूढा आदमी उस ढाबे के कोहरा रोकने में फिसड्डी टाट ओर तिरपाल के साये में सोने कि कोशिश कर रहा होगा जब आपका फोन उसके पास पहुंचा |
सर्दी बहुत ज्यादा है और बावर्ची का बिल्कुल भी मन नही है कि वो अपनी रजाई से बाहर निकले मगर उसको अपना वादा याद आता है कि ड्राईवर ढाबा हमेशा आपकी भूख में आपके साथ है,बावर्ची उठता है और जल्दी से आपके परांठे तैयार करता है एक पोलीथीन में डालता है आपका सॉस और प्याज़ वगैरा लेकर साईकिल पे बैठ जाता है और आपके अगले फोन का इंतज़ार करता है ,कभी कभी वो आपका इन्तेज़ार कॉलेज के गेट पर करता मिलता है और आप अपने दस पैसे बच जाने को लेकर खुश हो जाते  हैं |
इस ढ़ाबे का नाम ड्राईवर क्यों रखा गया इस सवाल पर मैंने कई बार गौर किया और एक दीन दद्दू (प्रोप्रायटर ऑफ ढ़ाबा  ) से पूछ ही लिया तो उन्होंने बताया कि पहले वो एक ड्राईवर हुआ करते थे और अपने ट्रक को दक्षिण भारत में ले कर जाया करते थे पन्द्रह साल तक ये सिलसिला चलता रहा और फिर एक एक्सीडेंट की वजह से उन्होंने ट्रक चलाना छोड दिया ....अपने इस डेढ़ दशक के करियर में उन्होंने ढ़ाबे के धंदे और अच्छा खाना खा कर मिलने वाले सुकून को करीब से देखा था इसलिए जब उन्होंने ट्रक चलाना छोड़ा तो खाना बनाना और खिलाना शुरू किया और इसी काम को अपना धन्दा भी बना लिया और हम जैसे भुक्कड़ स्टुडेंट्स की  दुआएँ लेने का सिलसिला चल निकला  |
दद्दू के ढ़ाबे पे हर तरह के बंदे आते हैं कुछ उधार चंद भी आते हैं जो कई हज़ार रुपए का माल हजम कर जाते हैं उनमें से कई झिक झिक से तो कुछ यूँ किसी रोज अचानक ही हरे नोट दद्दू को देकर खुश कर देते हैं अब यहाँ कुछ ऐसे भी महानुभाव पाए गए हैं जो दद्दू को हज़ार या कुछ सौ रुपल्ली का चूना लगा कर निकल लिए हैं मगर दद्दू ने आज भी उधारी   देना बंद नही किया है  |
आज इस हॉस्टल में मेरे ज्यादा दिन नही बचे हैं तो अब बात पेश ए नज़र आयी है कि जब कोई इतना काम आये  तो उसकी कमी को महसूस भी करना जरूरी है और मेरे साथ भी यह बात सच है| अब कुछ दिन में ही मैं यह कॉलेज छोड के चला जाने वाला हूँ साथ ही  साथ रात को मिलने वाली यह छोटी सी राहत भी मगर जब भी कभी राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर दो आया तो इस ढ़ाबे पे अपनी कार जरूर रोकूँगा,कुछ आर्डर करूँगा और याद करूँगा कि किस तरह मैं और जुनैद या मैं और बद्रे जमील+अनुज साहू परांठे लेने जाया करते थे,या जब कुलदीप ने अपने जन्मदिन की पार्टी दी थी तो हमने कितने मज़े किये थे या फिर आदित्य सिंह से परांठे को बचा लेना कितना मुश्किल था और उसको वही बैठ कर हज़म करने की कामयाब दलील भी दी जातीं थी |

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